GDS कर्मचारियों के नियमितिकरण और पेंशन की मांग पर दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश, दो हफ्ते में जवाब दे भारत सरकार

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नई दिल्ली: डाक विभाग GDS कर्मचारियों के नियमितिकरण और पेंशन मांग के एक केस की सुनवाई करते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने भारत सरकार से दो हफ्तों में जवाब मांगा है। एक रिट पिटिशन की सुनवाई करते हुए न्यायाधीश राजीव शाकधर और न्यायाधीश तारा वी गंजू की खंडपीठ ने ये आदेश जारी किए हैं। सिविल पिटिशन रघुनाथ सिंह बनाम भारत सरकार केस में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विनोद शर्मा ने कोर्ट में दलील दी कि याचिका कर्ता रघुनाथ सिंह सियोल (कांगड़ा) से ब्रांच पोस्ट मास्टर, पंडित हरिचंद जंबल (कांगड़ा) ब्रांच पोस्ट मास्टर और ग्रामीण डाकसेवक हेमराज 30 साल या इससे ज्यादा साल से विभाग में सेवाएं देने के बाद सेवानिवृत्त हुए हैं, लेकिन डाक विभाग ने इन्हें न तो अपना रेगुलर कर्मचारी माना और न कोई पेंशन आदि का लाभ दिया, जबकि ये लोग फुल टाइम सेवाएं देते रहे और विभागीय व्यवस्था को सुदढ़ करते रहे। इन कर्मचारियों की अनदेखी से जाहिर है कि विभाग जीडीएस रूल्स 211 के प्रावधान 3ए व 6, जो भारत के संविधान अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन कर रहे हैं। इस मामले पर उच्च न्यायालय ने भारत सरकार के दो हफ्तों के भीतर स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

फुल टाइम ड्यूटी, तो पार्ट टाइम का दर्जा क्यों

अधिवक्ता विनोद शर्मा ने दलील दी कि एक ग्रामीण डाक सेवक 25 से 30 किलोमीटर क्षेत्र में डाक बांटता है। इतना बड़ा क्षेत्र तीन-चार घंटों में कवर नहीं किया जा सकता, लेकिन फुल टाइम ड्यूटी देने के बाद भी ग्रामीण डाकसेवक को विभाग पार्ट टाइम कर्मचारी मानता है। इसके अलावा ब्रांच पोस्ट मास्टर के अधीन काफी ज्यादा क्षेत्र का जिम्मा होता। एक ब्रांच पोस्ट मास्टर को हजारों खाते मेंटेन करने पड़ते हैं। इसके अलावा विभागीय योजनाओं को चलाना पड़ता है, जो तीन-चार घंटों में 1 संभव नहीं है। इसलिए इन कर्मचारियों को पार्ट टाइम कर्मचारी की श्रेणी में रखना न्यायसंगत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने भी ग्रामीण डाक सेवक को ग्रुप सी पोस्ट का हकदार माना है, लेकिन डाक विभाग सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को नजर अंदाज करते हुए इन्हें पार्ट टाइम कर्मचारी बता रहा है, जो कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन है।

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